Uttarakhand History In Hindi | उत्तराखण्ड का इतिहास

 

उत्तराखण्ड की History के बारे में जानना व पढ़ना चाहते हो तो आप बिलकुल सही पोस्ट पर आये हैं. यहाँ इस पोस्ट में मैंने लिखा है, उत्तराखण्ड का इतिहास. इस पोस्ट आप जान पाएंगे कुछ पौराणिक कथाओं के बारे में जिनमे ज़िक्र है पांडव के उत्तराखण्ड सम्बन्ध का और क्यों इसे देवभूमि उत्तराखण्ड के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास की जानकारी भी इस पोस्ट के माध्यम से आपको होगी. 

 

 

उत्तराखण्ड का इतिहास 

 
 
उत्तराखण्ड भारत के उत्तर प्रदेश राज्य से 9 नवम्बर 2000 को अलग होकर बना एक राज्य है। इसे 2006 तक उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। वर्तमान उत्तराखण्ड राज्य अंग्रेजों द्वारा 1902 में बनाया गया “आगरा और अवध संयुक्त प्रांत” का हिस्सा था। 1935 से इसे “संयुक्त प्रान्त” के नाम जाना जाने लगा। जनवरी 1950 में “संयुक्त प्रान्त” नाम बदल कर “उत्तर प्रदेश” रखा गया। 9 नंवबर, 2000 तक भारत का 27वां राज्य बनने से पहले तक उत्तराखण्ड उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा बना रहा। 
 
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Uttarakhand History

 

 

उत्तराखंड को देवभूमि मानने का कारण 

उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। इसका सीधा सा कारण यह है कि विशाल और पवित्र पर्वत हिमालय का बहुत बड़ा हिस्सा उत्तराखंड में है, जहाँ अनेकों देवी देवताओं का वाश रहा है और है। हमारे देश के जितने भी ऋषि मुनि हुए हैं उन्होंने अपनी तपस्या यहीं पूरी की।  उन्ही के तपोबल से उत्तराखंड में अनेक शक्तियों का मिलना आम बात है। उत्तराखंड में अनेक तीर्थस्थलों के होने के कारण भी इसे देवभूमि उत्तराखंड के नाम से जाना जाता है।
 

पौराणिक मान्यता  (Mythological belief)

प्राचीन धर्मग्रंथों में उत्तराखंड के बारे में उल्लेख मानसखंड, केदारखंड और हिमवंत के रूप में किया गया है। 
विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत व रामायण और पुराणों की रचना उत्तराखंड में ही हुई थी। उत्तराखंडी लोक कथाओं के अनुसार पांडव यहाँ पर आये थे और उन्ही लोक कथाओं के अनुसार बाबा केदारनाथ के मंदिर कि नीव भी एक पांडव (भीम) द्वारा ही रखी गई थी । उत्तराखंड के बारे में और भी बहुत कुछ कहा जाता है। यहाँ की लोक कथाओं में, जिनके अनुसार हमारे देश के सबसे महान लेखक और कवी जैसे कालिदास, सूरदास, कबीरदास का भी सीधा सम्बन्ध रहा है उत्तराखंड से।  उत्तराखंड के बारे में प्रचलिक कथा है कि हिन्दू धर्म के पुनरुद्धारक आदि गुरु शंकराचार्य जी ने यहाँ बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना की थी। शंकराचार्य द्वारा स्थापित इस मन्दिर को हिन्दुओं का चौथा और आखिरी मठ माना जाता है।
 
Uttarakhand History In Hindi

 

उत्तराखण्ड का राजनीतिक इतिहास 

उत्तराखंड भारत के उत्तर प्रदेश राज्य से 9 नवम्बर 2000 को अलग होकर बना एक स्वतंत्र राज्य है। इसे 2006 तक उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था। वर्तमान उत्तराखंड राज्य अंग्रेजों द्वारा 1902 में बनाया गया “आगरा और अवध संयुक्त प्रांत” का हिस्सा था। 1935 से इसे “संयुक्त प्रान्त” के नाम से जाना जाने लगा। जनवरी 1950 में “संयुक्त प्रान्त” नाम बदल कर “उत्तर प्रदेश” रखा गया। 9 नंवबर, 2000 तक भारत का 27वां राज्य बनने से पहले तक उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा बना रहा। 
गणराज्य भारत का ये राज्य (उत्तराखंड) वैदिक संस्कृति के रूप में सबसे आगे हैं। यहाँ वैदिक संस्कृति के सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। जैसे के चार धाम (बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री)।  उत्तराखंड अपनी भौगोलिक स्तिथि, नैसर्गिक, जलवायु,  प्राकृतिक दृश्यों एवं संसाधनों की प्रचुरता के कारण भी देश में प्रमुख स्थान रखता है। देहरादून उत्तराखंड की राजधानी है। उत्तराखंड आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले पहाड़ में ही राजधानी चाहते थे। इनका मानना था कि उत्तराखंड एक पहाड़ी राज्य है तो इसकी राजधानी भी पहाड़ में ही होनी चाहिए। इस विचार का समर्थन उत्तराखंड के मूलनिवासियों का एक बहुत बड़ा तबका करता है। यह मामला अभी भी विचाराधीन है, जिसके कारण समय समय पर राजधानी गैरसैण (चमोली जिले का एक शहर) ले जाने की बात की जाती रही है।  इसका मुख्या कारण यह भी है कि गैरसैण शहर उत्तराखंड के मध्य में स्तिथ है। गैरसैण फ़िलहाल उत्तराखंड राज्य कि ग्रीष्म कालीन अस्थाई राजधानी है। 
 

उत्तराखंड का गणतंत्र इतिहास 

 
स्वतन्त्र भारत में फिर से एक बार इस बात पर चर्चा हुई, जब रामपुर और  टिहरी गढ़वाल के दो स्वायत्त राज्यों को संयुक्त प्रान्त में मिलाया गया। जब 1950 में नया संविधान बनाये जाने के साथ ही संयुक्त प्रान्त का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रखा गया और यह नए भारतीय संघ का संविधान-सम्मत राज्य बन गया। उत्तर प्रदेश के गठन के तुरंत बाद ही इस क्षेत्र में गड़बड़ियां शुरू होने लग गई। यह महसूस किया जाने लगा कि राज्य की बहुत विशाल जनसंख्या और भौगोलिक आयामों के कारण लखनऊ में बैठी उत्तर प्रदेश सरकार के लिए उत्तराखण्ड के लोगों के हितों का ध्यान रखना असम्भव है। गरीबी, बेरोज़गारी, पेयजल की समस्या और उपयुक्त आधारभूत ढांचे जैसी बुनियादी सुविधाओं में दिक्कत  और इस क्षेत्र का सही से विकास न होने के कारण यहाँ (उत्तराखण्ड) की जनता को आंदोलन का सहारा लेना पड़ा। शुरुआत में आन्दोलन कुछ ज्यादा मजबूत नहीं हो पाया लेकिन बाद में जाकर 1990 के दशक में इसने जोर पकड़ा। उसके बाद 1994 के मुजफ्फनगर में इसकी रफ्तार चरम सीमा पर पहुँची। उत्तराखंड की सीमा से 20 किमी दूर मुजफ्फनगर जिले में, जो कि  अभी उत्तरप्रदेश में है, रामपुर तिराहे पर मौजूद स्मारक उस आन्दोलन का सबसे अहम् गवाह है, जहाँ 2 अक्टूबर 1994 को लगभग 40 आन्दोलनकारी शिकार हुए थे पुलिस की गोलियों का। लगभग एक दशक के इस बड़े समय के संघर्ष के फलस्वरूप पहाड़ी क्षेत्र के सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की पहचान और बेहतर विकाश के लिए उत्तरांचल राज्य का जन्म हुआ।
 
 
मुझे उम्मीद है कि आपको इस पोस्ट के माध्यम से उत्तराखण्ड के इतिहास के बारे में काफी कुछ जानने को मिला होगा।  अगर कोई भी सुझाव या शिकायत हो इस जानकारी से सम्बंधित तो कमेंट बॉक्स में कमेंट करके अपने विचार हम तक पहुचाएं। जानकारी सही लगी हो तो अपने परिजनों तक भी ये पोस्ट पहुंचाने में हमारा सहयोग करें। धन्यवाद। 
 
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हेलो, मेरा नाम सूर्य जोशी है, मै उत्तराखण्ड के टिहरी जिले का रहने वाला हूँ। मैंने अपनी ग्रेजुएशन हेमन्ती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी से पूरी की है, और मै मारुती सुजुकी में पिछले 7 साल से Sales में बतौर Relationship Manager काम कर रहा हूँ। पिछले 2 साल से पार्ट टाइम Blogging कर रहा हूँ।

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